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दीपिका का जेएनयू जाना गलत क्यों?

फिल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण का जेएनयू जाना भी सियासत की भेंट चढ़ गया। जेएनयू पहुंच कर दीपिका ने एक शब्द भी नहीं बोला, हालांकि वह प्रदर्शनकारियों के साथ दिखी थीं। दीपिका घायल छात्रा से मिलीं, उसके सामने हाथ जोड़ा और उसे हिम्मत और तसल्ली दी थी। यह एक लड़की के दूसरी लड़की को हिम्मत बंधाने जैसा था।
पिछले रविवार को जब जेएनयू में नकाबपोश गुंÞडे डंडे लेकर पहुंचे, तो उन्होंने लड़कियों को भी नहीं बख्शा। दीपिका का वहां जाना कइयों को नागवार लगा। उन्हें देशद्रोही तक बताया। इसके बावजूद कि केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कह चुके हैं कि यह दीपिका की अपनी मर्जी है कि वह कहां जाएं. किसे सपोर्ट करें। इससे भाजपा को कोई परेशानी नहीं है। वैसे अक्षय कुमार ने जब पीएम मोदी का इंटरव्यू किया था, तो उस पर एक खास तबका ने तमाम सवाल खड़े कर दिए थे। यह नहीं कहा जा सकता कि किसी फिल्मी हस्ती के इस तरह के क्रियाकलाप को लोग नजरंदाज करते हैं। इंटरव्यू और पीएम की आलोचना की जा सकती है लेकिन अक्षय कुमार ने तो इंटरव्यू किया था, फिर उन्हें भक्त बताया गया। यह सोच अच्छी नहीं है।
सिलेब्स की भी अपनी राय होती है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए पर दीपिका के मामले में कुछ ज्यादा ही हो गया। यहां तक कि धमकी देने वाले भी सैकड़ों जुट गए। उनकी फिल्मों का बायकॉट शुरू हो गया है। इस बीच मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकार ने दीपिका की फिल्म को टैक्स फ्री कर इसे और राजनीतिक रंग दे दिया।
बीते दौर में पृथ्वीराज कपूर से लेकर दिलीप कुमार और सुनील दत्त ने भी राजनैतिक नेताओं और उनके एजेंडे के लिए काम किया है। पृथ्वीराज कपूर तो नेहरू के पसंदीदा थे। उनके साथ विदेश यात्राओं पर भी गए थे। बाद के वर्षों में अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ और जीत चुके हैं। विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा लंबे समय तक बीजेपी के साथ जुड़े रहे। अभी भी सत्ताधारी बीजेपी से लेकर हर राजनैतिक दल के पास सिलेब्रिटीज की लाइन है। वे चुनाव लड़कर सांसद और विधायक बने हुए हैं पर दीपिका हमें फूटी आंख नहीं भा रहीं। इसके बावजूद कि उनके राजनैतिक मत के बारे में हम कुछ नहीं जानते। जानते सिर्फ इतना हैं कि उन्होंने जेएनयू हिंसा पर दुख जताया। ऐसा बड़े-बड़े नेताओं ने भी किया। भले ही वे वहां गए नहीं।
बहुतों ने कहा कि दीपिका जेएनयू कभी न जातीं, अगर वह दिल्ली में अपनी फिल्म छपाक का प्रमोशन न कर रही होतीं। कइयों ने इसे पब्लिसिटी स्टंट बताया। अगर यह सही भी है तो इसमें क्या गलत है? गलत इसलिए है क्योंकि जब भी कोई औरत अन्याय, पक्षपात या हिंसा के खिलाफ अपनी राय रखती है, उसे आलोचनाएं ही सहनी पड़ती हैं।
स्वरा भास्कर काफी मुखर हैं। जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंसा के बाद भी उन्होंने ट्वीट किया था। वैसे अलग-अलग मंचों पर अपनी राय जाहिर करने के कारण उन्हें अपना काम से हाथ धोना पड़ा है और एंडोर्समेंट्स से भी। पिछले आम चुनावों में उन्होंने अलग-अलग राजनैतिक दलों के छह उम्मीदवारों के लिए चुनाव प्रचार किया तो छह ब्रांड्स ने उन्हें अपने कैंपेन से हटा दिया पर वह पीछे नहीं हटीं। यह पहली बार है कि किसी मेनस्ट्रीम बॉलिवुड ऐक्टर की मौजूदगी पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। हिंसा के शिकार लोगों के साथ खड़ा होना क्या गलत है?

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  1. ปั้มไลค์

    Like!! Great article post.Really thank you! Really Cool.

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