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राजपक्षे बने श्रीलंका के राष्ट्रपति, आशंकित हैं तमिल, मुस्लिम

कोलंबो। श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव में चीन के करीबी माने जाने वाले गोटबाया राजपक्षे को जीत मिली है, जो पूर्व प्रेसिडेंट महिंदा राजपक्षे के ही भाई हैं। भले ही यह घटनाक्रम श्रीलंका की आंतरिक राजनीति का है, लेकिन भारत के लिए भी यह चिंता बढ़ाने वाला है। दरअसल, गोटबाया को चीन की तरफ झुकाव रखने वाला माना जाता है। इसके अलावा तमिल हथियारंबद संगठन लिट्टे के खिलाफ जंग के लिए भी उन्हें याद किया जाता है। एक वर्ग मानता है कि उन्होंने बेहद निर्दयता के साथ लिट्टे के खात्मे के लिए अभियान चलाया था। उन्हें टर्मिनेटर भी कहा जाता है।
गोटबाया की इस द्वीपीय देश में विवादित एवं नायक दोनों की छवि है। बहुसंख्यक सिंहली बौद्ध उन्हें युद्ध नायक मानते हैं, जबकि अधिकतर तमिल अल्पसंख्यक उन्हें अविश्वास की नजर से देखते हैं। गोटबाया 70 वर्षीय नेता हैं, जिन्होंने 1980 के दशक में भारत के पूर्वोत्तर स्थित काउंटर इंसर्जेंसी एंड जंगल वारफेयर स्कूल में प्रशिक्षण लिया था। बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति रहने के दौरान उन्होंने वर्ष 2005 से 2014 में रक्षा सचिव की जिम्मेदारी भी निभाई थी। वर्ष 1983 में उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से रक्षा अध्ययन में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। गोटबाया वर्ष 2012 और 2013 में रक्षा सचिव रहते भारत के दौरे पर आए थे। तमिल मूल के परिवार जिनके अपने गृहयुद्ध के दौरान मारे गए या लापता हो गए हैं, वे गोटबाया पर युद्ध अपराध का आरोप लगाते हैं।
सिंहली बौद्धों में गोटबाया की लोकप्रियता से मुस्लिम समुदाय भी आशंकित रहता है। उन्हें आशंका है कि ईस्टर के मौके पर इस्लामी आतंकवादियों के गिरजाघरों पर किए गए हमले के बाद दोनों समुदायों में पैदा हुई खाई और चौड़ी होगी। हिंदू और मुस्लिम की संयुक्त रूप से श्रीलंका की कुल आबादी में 20 फीसदी हिस्सेदारी है। राष्ट्रपति चुनाव के लिए श्रीलंका पीपल्स पार्टी (एसएलपीपी) का प्रत्याशी नामित होने के बाद अक्टूबर में पहली बार मीडिया से बातचीत करते हुए गोटबाया ने कहा था कि अगर वह जीतते हैं तो युद्ध समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के समक्ष जताई गई प्रतिबद्धता या मेलमिलाप का सम्मान नहीं करेंगे। उनके इस बयान के चलते अल्पसंख्यकों के बीच चिंताएं और बढ़ी हैं।

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