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एस्टीमेट में स्ट्रिप के लिए ब्रांडेड कंपनी के नाम क्यों नहीं खोले?

  • अलग-अलग टेंडर होते तो बचती धनराशि
  • कॉम्पीटिशन से गुणवत्ता में भी आता सुधार
  • दिल्ली की फर्म का कराया गया पंजीकरण

तिरंगी एलईडी स्ट्रिप प्रोजेक्ट चढ़ा भ्रष्टाचार की भेंट

भले ही मेयर नवीन जैन कहते हों कि ‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा’, लेकिन नगर निगम में भ्रष्टाचार चरम पर है। चाहे निर्माण कार्यों में कमीशनबाजी हो या डीजल चोरी। नये प्रोजेक्ट की शुरुआत अच्छी पेश होती है, लेकिन उसके पीछे कहीं न कहीं पर्दे में भ्रष्टाचार छिपा होता है। यदि अधिकारी नगर निगम के हितेषी हैं तो प्रोजेक्ट्स में मानकों का ध्यान क्यों नहीं रखते हैं? तिरंगी एलईडी स्ट्रिप प्रोजेक्ट के एस्टीमेट में किसी ब्रांडेड कंपनी के नाम क्यों नहीं खोले? स्ट्रिप की गुणवत्ता को कौने से मानक किये गये तय? क्या फर्म विशेष को लाभ पहुंचाने का षड्यंत्र रचा गया?
भ्रष्टाचार पर वार करने के लिए देश की मोदी और प्रदेश की योगी सरकार एक के बाद एक निर्णय ले रही है। इसके बाद भी आगरा में देशभक्ति की भावना की रोशनी बिखेरने वाला तिरंगी एलईडी स्ट्रिप प्रोजेक्ट कैसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया? एस्टीमेट से लेकर पोल तक गुणवत्ता और अनदेखी उजागर हो रही है। कहीं मेयर की कार्यप्रणाली के खिलाफ अधिकारी षड्यंत्र तो नहीं रच रहे हैं। डेढ़ करोड़ रुपये के तिरंगी एलईडी स्ट्रिप प्रोजेक्ट की पोल खुलने लगी है। आधी-अधूरी और पूरी स्ट्रिप बंद देख जनता भी समझने लगी है। नुक्कड़बाजी से लेकर सोशल मीडिया पर प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार होने की खूब चर्चा होने लगी है। इस प्रोजेक्ट में करीब 50-60 फीसदी की धनराशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने की चर्चाएं हैं। ये चर्चाएं नगर निगम में भी हो रही हैं। चर्चाओं को जोर देने में स्ट्रीट लाइट्स के पोलों पर लगी चाइनीज एलईडी स्ट्रिप हैं, जो अभी से मरम्मत की जद में आ गई हैं। उद्घाटन के अगले दिन से ही स्ट्रिप अपनी गुणवत्ता से एमजी रोड पर आवागमन करने वाले राहगीरों को परिचय कराने लगी थीं। ये सिलसिला अभी जारी है। किसी न किसी पोल पर स्ट्रिप की मरम्मत करते लोग नजर आ जाएंगे। बात रही बंद स्ट्रिप की तो इसे रात में बखूबी देखा जा सकता है।
सूत्रों की मानें तो इस प्रोजेक्ट में एक नहीं कई अनदेखी हुई हैं जो भ्रष्टाचार की ओर इशारा कर रही हैं। सबसे पहले जब तिरंगी एलईडी स्टिप का प्रोजेक्ट बना तो अधिकारी उसे पार्षदों (सदन) के सामने क्यों नहीं लाये। मामला शहर का था, अच्छाई और बुराई से पार्षदों को जनता की नजरों से सामना करना है। जब कोई नियम लागू होता है तो उसे सदन में लाया जाता है, फिर इस प्रोजेक्ट को क्यों नहीं लाया गया? यदि प्रोजेक्ट की धनराशि सदन के अधिकार से अधिक थी तो प्रस्ताव को स्वीकृति के लिए शासन में क्यों नहीं भेजा गया? जिस मद से इस कार्य को कराया जा रहा है उसमें इतनी मोटी धनराशि का टेंडर करना भी नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
सूत्रों की मानें तो अधिकारियों ने इस प्रोजेक्ट में कुछ ज्यादा ही रुचि दिखाई। यदि वे इतनी रुचि समस्याओं के समाधान में दिखाएं तो शहर की जनता को परेशानी न झेलनी पड़े। एस्टीमेट से लेकर टेंडर तक के कार्य रातोंरात हुये। जिस फर्म को यह कार्य सौंपा गया है उसका पंजीकरण कराया गया। इस फर्म से एक अधिकारी का जुड़ाव है। इसलिए उसे लाभ पहुंचाने और भ्रष्टाचार करने के लिए किसी ब्रांडेड कंपनी के नाम दिये गये। यदि कुछ कंपनियों के नाम देते तो फर्म को महंगी रेट में स्ट्रिप मिलतीं, उन पर कंपनी का होलमार्क या नाम रहता। कमाई ज्यादा नहीं हो पाती। इससे कमीशन पर भी प्रभाव पड़ता। कमीशन का जो आंकड़ा तय हुआ, उसे फर्म कैसे पूरा कर पाती, इसलिए अधिकारियों ने एस्टीमेट में किसी ब्रांडेड कंपनी के नामों का जिक्र नहीं किया। चाइनीज स्ट्रिप के लिए रास्ता खोल दिया। जबकि इनका भुगतान ब्रांडेड कंपनियों की तिरंगी एलईडी स्ट्रिप के भुगतान को भी पीछे छोड़ देगा।
अधिकारी तो एक ही बात कहते हैं ब्रांडेड कंपनी एलईडी स्ट्रिप बनाती नहीं हैं, इसलिए उनके नामों को जिक्र नहीं किया। अधिकारी कितना सही बोल रहे हैं जनता सब जानती है। गूूगल पर ब्रांडेड कंपनियों को सर्च करेंगे तो एलईडी स्ट्रिप और उसकी रेट नजर आएगी। भले ही वो भी इस स्ट्रिप का निर्माण चाइना में करवाते हों, लेकिन उसे अपनी कंपनी का नाम देते हैं। कंपनी के नाम से बिकती है। ग्राहक भी उसे कंपनी के विश्वास के आधार पर खरीदते हैं। जब ब्रांडेड कंपनी स्ट्रिप (कोई और प्रॉडक्ट)को अपना नाम देती है तो उसकी गुणवत्ता का ख्याल जरूर रखती है। शहर में जो स्ट्रिप लगाई जा रही हैं उन पर किसी कंपनी का नाम नहीं है। पैकिंग कवर पर जो नाम है वह भी कोई ब्रांडेड नहीं है।

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