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चंद्रमा की कक्षा में दाखिल हुआ चंद्रयान-2

सात सितंबर को चांद की सतह पर उतरेगा चंद्रयान-2
चंद्रमा की कक्षा में पांच बार दिशा बदलेगा स्पेसक्राफ्ट

हैदराबाद। श्रीहरिकोटा से लॉन्चिंग के 29 दिन बाद चंद्रयान-2 आज सुबह 9.30 बजे चांद की कक्षा में प्रवेश कर लिया है। इसके साथ अंतरिक्ष में भारत को एक बार फिर बड़ी उपलब्धि मिल गई है। अब सात सितंबर को चंद्रयान-2 चंद्रमा पर ऐतिहासिक उपस्थिति दर्ज कराएगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के मुताबिक, चंद्रयान-2 पर लगे दो मोटरों को सक्रिय करने से यह स्पेसक्राफ्ट चंद्रमा की कक्षा में पहुंच गया है।
इसरो के चेयरमैन के सिवन ने बताया कि चंद्रयान-2 चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश करने के साथ ही कड़ी परीक्षा से गुजरेगा। चांद की कक्षा में प्रवेश करने के साथ ही स्पेसक्राफ्ट की स्पीड धीमी करने के लिए आॅनबोर्ड प्रोपल्शन सिस्टम को फायर किया जा रहा है ताकि स्पेसक्राफ्ट चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव में आ सके। उन्होंने बताया कि चंद्रयान-2 के चंद्रमा की कक्षा में पहुंचने के बाद इसरो कक्षा के अंदर स्पेसक्राफ्ट की दिशा में चार बार (21, 28 और 30 अगस्त तथा एक सितंबर को) और परिवर्तन करेगा। स्पेसक्राफ्ट की दिशा में एक परिवर्तन आज ही कुछ देर के बाद किया जाना है। कुल पांच बार दिशा परिवर्तन के बाद स्पेसक्राफ्ट चंद्रमा के ध्रुव के ऊपर से गुजरकर उसके सबसे करीब 100 किलोमीटर की दूरी की अपनी अंतिम कक्षा में पहुंच जाएगा। इसके बाद विक्रम लैंडर दो सितंबर को चंद्रयान-2 से अलग होकर चंद्रमा की सतह पर उतरेगा।
इसरो के पूर्व चीफ किरण कुमार ने बताया कि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव 65000 किमी तक है, जिसका मतलब है कि उस दूरी तक वह स्पेस बॉडी को खींच सकता है। 20 अगस्त को जब चंद्रयान-2 इसकी कक्षा से लगभग 150 किमी दूर होगा तो इसरो इसकी दिशा में बदलाव करेगा। इस दौरान हम चंद्रयान-2 को महत्वपूर्ण वेग प्रदान करेंगे, जिससे चंद्रयान-2 अपनी गति को कम करके दिशा में बदलाव करके चंद्रमा की कक्षा में आसानी से प्रवेश कर सकेगा। इस समय अगर वेग अधिक होगा तो स्पेसक्राफ्ट चांद से अधिक दूर चला जाएगा।
इसके बाद विक्रम लैंडर दो सितंबर को चंद्रयान-2 से अलग होकर चांद की सतह पर उतरेगा। चंद्रयान-2 के सात सितंबर को चांद की सतह पर उतरने की उम्मीद है। सिवन ने बताया कि चंद्रमा की सतह पर सात सितंबर 2019 को लैंडर से उतरने से पहले धरती से दो कमांड दिए जाएंगे, ताकि लैंडर की गति और दिशा सुधारी जा सके और वह धीरे से सतह पर उतरे। आॅर्बिटर और लैंडर में फिट कैमरे लैंडिंग जोन का रियल टाइम असेसमेंट उपलब्ध कराएंगे। लैंडर का डाउनवर्ड लुकिंग कैमरा सतह को छूने से पहले इसका आकलन करेगा और अगर किसी तरह की बाधा हुई तो उसका पता लगाएगा। धरती और चंद्रमा के बीच की दूरी लगभग तीन लाख 84 हजार किलोमीटर है। चंद्रयान-2 में लैंडर-विक्रम और रोवर-प्रज्ञान चंद्रमा तक जाएंगे। चांद की सतह पर उतरने के चार दिन पहले रोवर विक्रम उतरने वाली जगह का मुआयना करना शुरू करेगा। लैंडर यान से डिबूस्ट होगा। विक्रम सतह के और नजदीक पहुंचेगा। उतरने वाली जगह की स्कैनिंग शुरू हो जाएगी और फिर छह-आठ सितंबर के बीच शुरू होगी लैंडिंग की प्रक्रिया। लैंडिंग के बाद छह पहियों वाला प्रज्ञान रोवर विक्रम लैंडर से अलग हो जाएगा। इस प्रक्रिया में चार घंटे का समय लगेगा। यह एक सेंमी प्रति सेकंड की गति से बाहर आएगा। 14 दिन यानी एक लूनर डे के अपने जीवनकाल के दौरान रोवर प्रज्ञान चांद की सतह पर 500 मीटर तक चलेगा। यह चांद की सतह की तस्वीरें और विश्लेषण योग्य डेटा इकट्ठा करेगा और इसे विक्रम या आॅर्बिटर के जरिए 15 मिनट में धरती को भेजेगा। चांद की सतह पर पहुंचने के बाद लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) 14 दिनों तक ऐक्टिव रहेंगे। रोवर प्रज्ञान चांद पर 500 मीटर तक घूम सकता है। यह सौर ऊर्जा की मदद से काम करता है। रोवर सिर्फ लैंडर के साथ संवाद कर सकता है। इसकी कुल लाइफ एक लूनर डे की है। जिसका मतलब पृथ्वी के लगभग 14 दिन होता है।

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