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आफ द रिकार्ड: अब किस मुंह से जाओगे जनता के बीच!

जनता ने एक बार ही चुना और कई सदस्य बिक रहे बार-बार
कोठी है, महंगी गाड़ी है लेकिन इज्जत दो कौड़ी की भी नहीं बची
अच्छे लोग राजनीति में ही नहीं, समाज करे ऐसे लोगों का बहिष्कार

लोकतंत्र में जनता जिस भरोसे और उम्मीद के साथ अपने नुमाइंदे को चुनती है, उस पर वह खरे नहीं उतरते हैं तो उनके प्रति जनता का क्या नजरिया होता है, यह बात किसी से छिपी नहीं। जिला पंचायत के चुनाव में मामला इससे हटकर है। जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर घमासान का इतिहास काफी पुराना है। कई दशक से यह खेल चल रहा है। आॅफ द रिकार्ड बात करें तो जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज होने के लिए दावेदार को करोड़ों रुपये खर्च करने होते हैं। जैसे बाजार से सामान खरीदने में मोल-भाव होता है, कमोबेश ऐसा ही कुछ सदस्यों को अपने समर्थन में लेने के लिए उन्हें मुंह मांगी रकम देनी पड़ती है।
पिछली बार सपा और बसपा के बीच जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर घमासान हुआ तो उसमें पहले सपा नेता लाल सिंह लोधी को करोड़ों रुपये का फटका लग गया। उसके बाद पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष दौलतराम कुशवाह की नाव बीच मझधार में डुबो दी गई। गनेश यादव इस कुर्सी पर आसीन हुए तो उन्हें भी कमोबेश पूर्व अध्यक्षों की तरह ही सब कुछ मैनेज करना पड़ा। इस बार चुनाव में पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष कुशल यादव के पति राजपाल यादव को इस कुर्सी के लिए काफी पापड़ बेलने पड़े। इसके बाद राकेश बघेल को जिला पंचायत अध्यक्ष बनने के लिए खूब कसरत करनी पड़ी। अब यशपाल चौधरी कुर्सी पर काबिज होने के लिए पसीना बहा रहे हैं, वहीं जिला पंचायत अध्यक्ष राकेश बघेल को भी इस कुर्सी पर टिके रहने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। अध्यक्ष की कुर्सी पर उठापटक के खेल में यदि चांदी काट रहे हैं तो वे हैं जिला पंचायत के कुछ बिकाऊ सदस्य। ऐसे कई सदस्य हैं जिनका जमीर नहीं बचा है। बार-बार पाला बदलने से उनकी साख भी खत्म हो गई है। जनता भी इस इंतजार में बैठी है कि एक बार फिर यह चुनाव मैदान में आएं और उनसे पूरा हिसाब चुकता करें। कई सदस्य तो ऐसे हैं पंचायत चुनाव में सदस्य चुने जाने से पहले उनकी अच्छी साख थी। उस वक्त न उनके पास बड़ा मकान था और महंगी गाड़ी। पहली बार खुद के बिकने पर उन्होंने महंगी गाड़ी खरीद ली और दूसरी बार बिकने पर मकान। अब तीसरी बार भी वह अपनी बोली लगवाकर बिक चुके हैं। ऐसे सदस्यों को लेकर जनता में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कई सदस्य समाज के लोगों से मुंह छिपाते हुए फिर रहे हैं। समाज के ईमानदार लोगों का कहना है कि राजनीति में ही नहीं, समाज में भी इनका बहिष्कार होना चाहिए।

चर्चा में ठाकुर हरेंद्र
और राकेश चौधरी

आगरा। जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर चल रही उठापटक में ठाकुर हरेंद्र सिंह एवं राकेश चौधरी की भूमिका चर्चाओं में है। दोनों लोगों ने अपने जमीर को सुरक्षित रखते हुए अंतर्राष्टÑीय स्तर पर भारत के राष्टÑीय चरित्र ‘गुट निरपेक्षता’ के सिद्धांत पर चलने का फैसला लिया। कुछ सदस्य बिक गए लेकिन इन दोनों ने लाखों की रकम में ठोकर मार दी और जनता तथा समाज के बीच अपनी साख को सुरक्षित रखा। विदित हो कि ठा. हरेंद्र सिंह की पत्नी सकला सिंह जिला पंचायत सदस्य हैं जबकि राकेश चौधरी स्वयं सदस्य हैं। सूत्रों के मुताबिक जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी बचाने एवं उस पर काबिज होने के लिए आफ द रिकार्ड चार से पांच करोड़ रुपये अब तक खर्च हो चुके हैं, अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर रार अभी बरकरार है इसलिए अभी और खर्चा होने की सम्भावना है।

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