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एसएसपी आॅफिस में भीड़ का मतलब थानों में सुनवाई नहीं?

  • प्रत्येक दिन सैकड़ों की तादाद में आ रहे हैं फरियादी
  • छोटी-छोटी समस्याओं के लिए दूर से आना पड़ रहा
  • एसएसपी फिर भी थाना पुलिस को नहीं दे रहे निर्देश

एसएसपी आॅफिस में इन दिनों वैसा ही नजारा देखने को मिल रहा है जैसा राशन की दुकान पर राशन वितरण के दौरान दिखता है। यहां फरियादियों का तांता लगा हुआ है। फरियादियों की संख्या भी चंद में नहीं, सैकड़ों में होती है। इससे साफ है कि थानों में पीड़ितों की सुनवाई नहीं हो रही, इसीलिए वे यहां आ रहे हैं।
बता दें कि आगरा में 43 थाने हैं। 17 थाने शहर में हैं और 26 देहात में। कई थाने ऐसे हैं जहां कोतवाल और थाना पुलिस पीड़ितों की सुनवाई नहीं कर रही। पीड़ितों की सुनवाई करने के बजाय उन्हें वर्दी का रौब दिखाकर थाने से भगा दिया जाता है। अगर मुकद्मे भी दर्ज हो गए हैं तो भी आगे कार्रवाई नहीं बढ़ रही। पीड़ित के पूछने पर पुलिसकर्मी डपटने लगते हैं। अभ्रदता पर उतर आते हैं। इसके अलावा घटना होने पर एफआईआर भी दर्ज नहीं की जा रहीं। इसी वजह से फरियादी एसएसपी बबलू कुमार के पास दौड़ लगा रहे हैं। अगर बीते कुछ दिनों के आंकड़े उठाकर देखें तो हर रोज भारी संख्या में फरियादी कलक्ट्रेट में एसएसपी से मिलने पहुंचे। अमित पाठक के समय में इतनी भीड़ कभी नहीं आई। अमित पाठक ने थाना पुलिस को साफ निर्देश दे रखे थे कि पीड़ित की एक बार में थाने में सुनवाई होनी चाहिए। वर्तमान कप्तान अभी यहां की कार्यशैली समझ रहे हैं। उनके दस दिन के कार्यकाल का ज्यादातर समय मंटोला बवाल और एक्सप्रेस वे पर हुए हादसे में बीता है। अब वे इन सब मामलों से फ्री हो गए हैं। कयास लगाए जा रहे हैं आने वाले दिनों में वे भारी फेरबदल कर संदेश दे सकते हैं कि थानों को कार्यशैली बदलनी होगी।
एक फरियादी तो कल एसएसपी के सामने काफी देर तक रोया। वह सदर का था। उसका आरोप था कि बुंदूकटरा चौकी प्रभारी संजय शर्मा उनकी कोई सुनवाई नहीं करते। मुकद्मा दर्ज करने के बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं की जा रही। एसएसपी के पास सीओ सदर भी बैठे थे। उन्होंने सीओ से फरियादी की मदद करने को कहा। फरियादियों की संख्या इतनी है कि एसएसपी नौ बजे से दो बजे तक उनकी समस्याओं को ही सुन पाते हैं, जबकि पूर्व के एसएसपी 11 बजे दफ्तर छोड़कर चले जाते थे। इसका एक कारण यह भी होता था कि जो फरियादी होते थे, वह कम होते थे।

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