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ठसक चलाने वाले साहबों की भी तो पहचान कराएं

यमुना एक्सप्रेस वे का बस हादसा

आगरा। यमुना एक्सप्रेस वे से झरना नाले में रोडवेज की बस गिरने से हुए हादसे में सरकारी तंत्र भले यह कहकर पल्ला झाड़ ले कि बस ड्राइवर को नींद आने से हादसा हुआ, लेकिन इसकी गहराई में जाएं तो अधिकारियों की उस मानसिकता का दोष सामने आएगा जो साहब होने की ठसक में कर्मचारियों पर अपने मनमाने फैसले थोपते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह अधिकारी कौन है जिसने रूट से अनजान एक ड्राइवर को लखनऊ से दिल्ली तक जाने वाली जनरथ ले जाने के लिए विवश किया।
यह बात साफ हो चुकी है कि दुर्घटनाग्रस्त बस का ड्राइवर पहली बार लखनऊ से दिल्ली रूट पर बस लेकर आ रहा था। लखनऊ से दिल्ली का मतलब दो एक्सप्रेस वे। लखनऊ से आगरा तक ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस वे और फिर आगरा से नोएडा तक यमुना एक्सप्रेस से बस जानी थी। दुर्घटनाग्रस्त बस को चला रहा ड्राइवर न तो रूट का जानकार था और न एक्सप्रेस वे पर बस दौड़ाने का अनुभव। यह हो सकता है कि रोडवेज अधिकारी ने इस रूट के ड्राइवर के न होने के कारण ही दूसरे रूट के ड्राइवर को इस बस को ले जाने के लिए कहा होगा, लेकिन इतना तो सोचा जाना चाहिए था कि एक तो एक्सप्रेस वे का सफर और दूसरी ओर रात में बस का संचालन। दिन के वक्त तो रूट का आसानी से पता चल जाता है, लेकिन रात में कोई भी अनजान ड्राइवर भटक सकता है। हादसे में घायल हुए यात्रियों का कहना था कि ड्राइवर कई बार रूट से भटका। गलत रास्ते पर जाने के बाद बस लौटाई। इसमें हुई देरी के कारण ही वह टाइम को कवर करने के लिए बस को बेतहाशा दौड़ा रहा था और इसकी परिणिति हुई भीषण हादसे के रूप में।
हैरानी की बात यह है कि सरकार ने अभी तक उस अधिकारी पर कोई एक्शन नहीं लिया है कि जिसने रूट से अनजान ड्राइवर को बस लेकर भेजा।

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