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कोशिशों के बाद भी दूर न हो सकी मतदाताओं की बेरुखी

आगरा उत्तर का उप चुनाव

  • एक माह बाद ही दूसरी बार मतदान के कारण पैदा नहीं हुआ उत्साह
  • दलित-मुस्लिम इलाकों में भी देखी गई पोलिंग को लेकर उत्साह की कमी
  • भाजपाई सक्रिय न हुए होते तो बमुश्किल 30 प्रतिशत हो पाता मतदान

आगरा। वही हुआ, जिसकी आशंका थी। प्रत्याशियों की लाख कोशिशों के बाद भी आगरा उत्तर विधान सभा सीट के उप चुनाव में अपेक्षित मतदान नहीं हो सका। लोकसभा चुनाव के महज एक माह बाद हुए इस चुनाव में मतदान 39.45 प्रतिशत मतदान ही हो सका। लोकसभा चुनाव में मतदान को लेकर जिस प्रकार का उत्साह था, वैसा उप चुनाव में नहीं दिखा। मतदाताओं को घरों से निकालने के सारे प्रयास भी बेअसर रहे। हर चुनाव में बढ़-चढ़ कर मतदान करने वाले मुस्लिम और दलित समुदाय में भी मतदान को लेकर बेरुखी देखी गई। भाजपाइयों ने प्रयास न किए होते तो मतदान 30 प्रतिशत पर ही सिमट जाता।
आगरा उत्तर पर विधायक जगन प्रसाद गर्ग के आकस्मिक निधन की वजह से उप चुनाव हुआ था। लोकसभा चुनाव के मतदान के दो दिन बाद यानि 21 अप्रैल को निर्वाचन आयोग ने इस रिक्त सीट पर उप चुनाव की घोषणा कर दी थी। इसके लिए न तो राजनीतिक दल तैयार थे और न आम लोग। फिर भी चूंकि चुनाव की घोषणा की जा चुकी थी, इसलिए चुनाव तो लड़ा जाना ही था। भाजपा ने पुरुषोत्तम खंडेलवाल, कांग्रेस ने रणवीर शर्मा और गठबंधन की ओर से सपा के सूरज शर्मा मैदान में उतरे थे। कुल 12 प्रत्याशी मैदान में थे।
आगरा उत्तर पर मतदाताओं की संख्या 4.9 लाख है। चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद से ही सभी प्रमुख प्रत्याशी इस बात को लेकर आशंकित थे कि मतदाताओं की चुनाव में रुचि कैसे पैदा की जाए। इसके लिए प्रचार के दौरान सभी प्रत्याशी मतदाताओं से यही अपील करते रहे कि वे अधिकाधिक संख्या में वोट डालें। मतदाताओं की उप चुनाव को लेकर बेरुखी की आशंका इसलिए बनी हुई थी क्योंकि 18 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के लिए मतदान हुआ था और ठीक एक माह बाद 19 मई को उप चुनाव के लिए मतदान होना था।
प्रत्याशियों खासकर भाजपा की ओर से मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए खासी तैयारियां की गई थीं। सपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों द्वारा भी अपने समर्थक मतदाताओं में उत्साह पैदा करने की कोशिशें की जाती रहीं। आगरा उत्तर पर मतदान के पहले चार घंटों यानि 11 बजे तक मतदान का प्रतिशत 19.5 प्रतिशत होने से सभी उत्साहित थे, लेकिन इसके बाद जैसे ही धूप तेज हुई, मतदान की गति बहुत धीमी होती चली गई। इसी के बाद भाजपा समेत दूसरे दलों के कार्यकर्ताओं ने घर-घर पहुंचकर लोगों को मतदान करने के लिए प्रेरित किया, लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद बहुत कम लोग मतदान करने पहुंचे। शाम छह बजे मतदान समाप्त होने के बाद कुल मतदान का जो आंकड़ा आया, वह बहुत निराश कर देने वाला था। इस सीट पर महज 39.45 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था।
जानकारों की मानें तो भाजपा के कार्यकर्ता फिर भी मतदाताओं को घरों से मतदान केंद्रों तक लाने में कामयाब रहे। जो लोग वोट डालने नहीं पहुंचे, उनके घरों पर दस्तक देने के साथ ही मोबाइल पर सम्पर्क कर उन्हें वोट डालने के लिए प्रेरित किया जा रहा था। मतदान के आंकड़ों पर गौर करें तो भाजपा समर्थित इलाकों में मतदान 40 से 50 प्रतिशत के बीच तक हुआ है जबकि सपा-बसपा समर्थित मुस्लिम और दलित इलाकों में 30 से 35 प्रतिशत लोग ही वोट डालने निकले। दलित-मुस्लिमों में उत्साह न होने के कारण भी मतदान का प्रतिशत गिरा। कम मतदान को लेकर भाजपा ही नहीं, सपा और कांग्रेस खेमे में भी मायूसी है। हालांकि भाजपाई अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं। उन्हें मलाल इस बात का है कि कम मतदान के कारण जीत का अंतर थोड़ा कम हो जाएगा।

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