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एटा: कल्याण-मुलायम के बाद उनके बेटों का अखाड़ा

राजवीर सिंह पिता की विरासत को संजोए रखने को पसीना बहा रहे तो अखिलेश अपने पिता के गढ़ पर फिर से झंडा फहराने को बेताब

एसपी सिंह
एटा संसदीय सीट पर मौजूदा सांसद राजवीर सिंह कड़े मुकाबले के बीच लगातार दूसरी जीत के लिए प्रयासरत हैं। एटा वह संसदीय सीट है जो कालांतर में सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव और भाजपा के दिग्गज नेता कल्याण सिंह (वर्तमान में राजस्थान के राज्यपाल) के बीच पिछड़ों के लिए जोर आजमाइश का केंद्र रही है। लोकसभा के इस चुनाव में फ्रंट पर न तो मुलायम सिंह हैं और न कल्याण सिंह। अब इन दोनों रातनेताओं के बेटे मोर्चा संभाले हुए हैं। भाजपा की ओर से कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह फिर से मैदान में हैं जबकि सपा की ओर से मैदान में उतरे देवेंद्र सिंह यादव लम्बे समय से मुलायम सिंह यादव के भरोसेमंद लोगों में से एक हैं। मुलायम सिंह के पुत्र एवं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव इस सीट पर फिर से कब्जा करने को पूरी ताकत लगाए हुए हैं। बसपा का साथ होने के कारण सपा इस सीट को लेकर बहुत उत्साहित नजर आ रही है।
एटा लोकसभा सीट पिछड़ा वर्ग बहुल है। एटा ऐसा क्षेत्र रहा है जहां यूपी की राजनीति में लम्बे समय तक शिखर पर छाए रहे मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह पिछड़ा वर्ग पर अपनी पकड़ साबित करने के लिए एक-दूसरे के सामने आते रहे हैं। लोगों को याद होगा कि एक बार विधान सभा चुनाव में ये दोनों दिग्गज नेता एटा जिले को अपना अखाड़ा बना चुके हैं। उस चुनाव में मुलायम सिंह ने एक साथ तीन सीटों, इटावा की जसवंतनगर, फिरोजाबाद की शिकोहाबाद और एटा की निधौली कलां से चुनाव लड़ा था। इसी चुनाव में कल्याण सिंह अलीगढ़ की अतरौली के अलावा एटा की कासगंज सीट से चुनाव लड़े थे। दोनों नेताओं ने अपनी-अपनी सीटें जीती थीं। एक ही चुनाव में एटा जिले में दोनों की मौजूदगी की वजह यही थी कि ये दोनों दिग्गज पिछड़ा वर्ग पर अपनी पकड़ साबित करना चाहते थे।
राजनीति में दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं, यह बात भी एटा पर सटीक बैठती है। कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव के बीच लम्बे समय तक पिछड़ों में खुद को बड़ा साबित करने की जंग चली, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में ऐसा मौका भी आया कि एटा संसदीय सीट पर निर्दलीय के तौर पर मैदान में मौजूद कल्याण सिंह का मुलायम सिंह यादव ने साथ दिया। उस चुनाव में कल्याण सिंह भाजपा से बाहर थे और वे भाजपा को सबक सिखाने के लिए मुलायम सिंह यादव की सपा का साथ दे रहे थे। तब सपा ने भी एटा पर कल्याण सिंह का समर्थन किया था।
अब कल्याण सिंह राजस्थान के राज्यपाल बनने के बाद सक्रिय राजनीति से दूर हो चुके हैं तो मुलायम सिंह यादव भी सपा में संरक्षक की भूमिका में आ चुके हैं। अब इन दोनों राजनेताओं के पुत्र सक्रिय राजनीति में हैं। 2009 में जीत के बाद फिर से भाजपा में लौटे कल्याण सिंह एटा की विरासत अपने बेटे राजवीर सिंह को सौंप चुके हैं। 2014 में भाजपा प्रत्याशी के रूप में वे पहली बार यहां से जीते थे। राजवीर सिंह इस बार भी यहां से भाजपा के प्रत्याशी हैं। उधर सपा की कमान संभाल चुके मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव एटा पर फिर से अपने पिता के समय वाला जलवा कायम करना चाहते हैं। गठबंधन में यह सीट सपा को ही मिली है और अखिलेश यादव ने अपने पिता के भरोसेमंद रहे पूर्व सांसद देवेंद्र सिंह यादव को ही मैदान में उतारा है। अप्रत्यक्ष रूप से कल्याण सिंह और मुलायम सिंह के बेटे ही इस क्षेत्र में आमने-सामने हैं।
राजवीर सिंह 2014 में पहली बार दो लाख से अधिक मतों के अंतर से जीते थे। तब राजवीर सिंह को 474978 मत मिले थे जबकि 273977 मत पाकर सपा के देवेंद्र सिंह यादव दूसरे स्थान पर रहे थे। उस चुनाव में बसपा के प्रत्याशी नूर उल हसन इंजीनियर को 1.37 लाख वोट मिले थे। पिछले चुनाव में सपा-बसपा को मिले मतों को जोड़ भी लें तो भाजपा के राजवीर सिंह लगभग 65 मतों से आगे रहे थे। एटा संसदीय सीट की पांचों विधान सभा सीटों से इस समय भाजपा के विधायक हैं। इनमें एटा से विपिन वर्मा डेविड, मारहरा से वीरेंदर सिंह लोधी, कासगंज से वीरेंद्र सिंह, पटियाली से ममतेश शाक्य और अमांपुर से वीरेंद्र सिंह विधायक हैं। इन पांचों सीटों में से कासगंज, पटियाली और अमांपुर कासगंज जिले का हिस्सा हैं। राजवीर सिंह भाजपा के परम्परागत वोट बैंक शाक्य, लोधी, बाह्रमण, ठाकुर, वैश्य, अन्य पिछड़ी जातियां व गैर जाटव दलित जातियों के सहारे हैं, लेकिन जन अधिकार पार्टी की ओर से पूर्व मंत्री सूरज सिंह शाक्य के मैदान में होने से शाक्य वोट बैंक को साधे रखना राजवीर सिंह के लिए चुनौती बन गया है। सूरज सिंह शाक्य को कांग्रेस का भी समर्थन है। इस सीट पर कल्याण सिंह और राजवीर सिंह की जीत में जिले के बहुसंख्यक शाक्य मतदाताओं की अहम भूमिका रही है। बड़े शाक्य वोट बैंक के बूते ही डॉ. महादीपक शाक्य पहले यह सीट कई बार भाजपा के लिए जीत चुके हैं। मौजूदा चुनाव की चुनौती को भांपकर ही एटा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा भी कराई जा चुकी है।
सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के प्रत्याशी देवेंद्र सिंह यादव 2004 में सपा के लिए यह सीट जीत चुके हैं। देवेंद्र यादव 2014 में भी सपा की ओर से चुनाव लड़े थे, लेकिन पराजित हो गए थे। अब वे इस सीट से तीसरी बार मैदान में हैं। इस चुनाव में बसपा का साथ होने के कारण देवेंद्र यादव अपने प्रतिद्वंद्वी राजवीर सिंह को कड़ी टक्कर देते दिखाई दे रहे हैं। देवेंद्र यादव यादव व मुस्लिमों के अलावा दलितों के वोट बैंक को लेकर तो आश्वस्त हैं ही, अपनी जीत के लिए कुछ और जातियों के साथ तालमेल बैठाने में लगे हुए हैं।
कुल मिलाकर एटा का चुनाव बहुत रोचक हो चला है। भले ही कल्याण सिंह और मुलायम सिंह सक्रिय राजनीति से दूर हैं, लेकिन एटा के रण में इन्हीं दोनों दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी दिखाई देती है। राजवीर सिंह अपने पिता द्वारा सौंपी गई विरासत को बचाए रखने के लिए प्रयासरत हैं तो अखिलेश यादव अपने पिता के पुराने गढ़ पर फिर से झंडा फहराने को बेताब हैं।

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