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सपा-बसपा में इतनी भगदड़ क्यों?

क्या दोनों दलों के गठबंधन को गले नहीं उतार पा रहे नेता और कार्यकर्ता?

लोकसभा चुनाव के दौर में सपा और बसपा के नेताओं के भाजपा में शामिल होने से सपा-बसपा-रालोद गठबंधन में हड़बड़ाहट की स्थिति है। भाजपा ने दूसरे दलों के नेताओं के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। भाजपा में शामिल होने की जिस तरह से होड़ लगी हुई है, उसे देखकर तो ऐसा लग रहा है कि विपक्षी दलों के नेता भाजपा के दरवाजे खुलने का इंतजार कर रहे थे। अब तक बसपा के नेता ही भाजपा में शामिल हो रहे थे, लेकिन पूर्व मंत्री रामसकल गुर्जर और पूर्व विधायक डॉ. राजेंद्र सिंह के भाजपा में आने के बाद यह आंच सपा तक भी पहुंच गई है। इससे एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या नेतृत्व के स्तर पर बने सपा-बसपा और रालोद के गठबंधन को निचले स्तर पर पार्टी के कार्यकर्ता गले नहीं उतार पा रहे?
पिछले एक माह के दौरान बसपा के तो तमाम दिग्गज पार्टी छोड़ चुके हैं। पूर्व विधायक डॉ. धर्मपाल सिंह, ठा. सूरजपाल सिंह और भगवान सिंह कुशवाह और वरिष्ठ नेता देवेंद्र चिल्लू जहां कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। वहीं पूर्व विधायक गुटियारी लाल दुबेश, उमेश सैंथिया, दिगम्बर सिंह धाकरे भाजपा का दामन थाम चुके हैं। मायावती सरकार में दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री रहे अजय शील गौतम ने भी बीते कल हाथी से उतरकर कमल थाम लिया। अनुशासन के लिए जानी जाने वाली बसपा में अब असंतोष के स्वर भी खुलकर सामने आने लगे हैं। टिकट न मिलने से अंसतुष्ट कुंवर चंद वकील, जिलाध्यक्ष रहे भारतेंदु अरुण को पार्टी पहले ही बाहर का रास्ता दिखा चुकी है।
अब बात करें सपा की। बीते कल दिल्ली में रेलमंत्री पीयूष गोयल के समक्ष अखिलेश यादव सरकार में मंत्री रहे रामसकल गुर्जर और फतेहाबाद के पूर्व विधायक डॉ. राजेंद्र सिंह ने भाजपा ज्वाइन की तो राजनीतिक हलकों में खलबली मच गई। रामसकल गुर्जर को मुलायम सिंह यादव का बहुत विश्वस्त माना जाता था। इससे पहले पूर्व विधायक अनुराग शुक्ला और दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री रहे नितिन गुप्ता ने भी सपा को बाय-बाय कर भाजपा का दामन थाम लिया था। पूर्व पार्षद हेमंत भोजवानी और उनकी पार्षद पत्नी भी सपा को छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं।
सवाल यह उठ रहा है कि सपा-बसपा में ऐसा क्या हो गया है कि उसके वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता भाजपा की ओर खिंचे चले जा रहे हैं। यह स्थिति तब और चिंतनीय हो जाती है जबकि दोनों दलों के बीच लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन हो चुका है। इस गठबंधन में रालोद भी उनके साथ है। तीनों दलों का यह गठबंधन वेस्ट से लेकर ईस्ट यूपी तक जीत के समीकरण बना रहा है। पार्टीजनों से बातचीत करने पर एक ही बात निकलकर आती है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती ने भले ही लखनऊ में बैठकर चुनावी तालमेल कर लिया हो, लेकिन निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में यह गले नहीं उतर पा रहा। वे इसे नेचुरल एलायंस नहीं मान रहे। इसकी वजह है कि 1995 में सपा और बसपा के बीच खटपट होने के बाद से दोनों दलों के बीच इतनी कड़वाहट रही है कि कार्यकर्ता साथ-साथ बैठकर भी सहज नहीं हो पा रहे। गठबंधन कितना प्रभावी हो रहा है, इसका अंदाजा फतेहपुरसीकरी लोकसभा क्षेत्र में देखा जा सकता है जहां रालोद के नेता भी आॅफ द रेकॉर्ड मानते हैं कि वे अपने जाट वोट बैंक को बसपा के पक्ष में मोड़ने में असमर्थ हैं। जाट वोट कांग्रेस और भाजपा के बीच बंट रहे हैं। यही स्थिति उन सीटों की है जहां से सपा के प्रत्याशी मैदान में हैं और बसपा समर्थक मतदाता खुद को सहज महसूस नहीं कर रहे। जिन सीटों से बसपा मैदान में हैं, वहां यही स्थिति सपा समर्थक मतदाताओं के साथ महसूस की जा रही है। हालांकि यह माना जा रहा है कि जब अखिलेश यादव, मायावती और चौ. अजित सिंह प्रचार के लिए उतरेंगे तो वे अपने समर्थकों को इस गठबंधन को स्वीकार कराने में कामयाब रहेंगे।

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