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बसपा में भगदड़ की वजहें समझिए!

पार्टी में बने रहने के लिए भी ‘योग्य’ होना जरूरी बर्दाश्त नहीं हो पा रहा

लोकसभा चुनाव के बीच में बसपा में मची भगदड़ पार्टी नेतृत्व के लिए एक सबक है। बसपा हाईकमान को अब यह समझ जाना चाहिए कि मनमानी थोपने का दौर अब बीत चला है। बीते कल जिले के तीन पूर्व बसपा विधायकों ने जिस तरह से बसपा से नाता तोड़कर कांग्रेस ज्वाइन की है, उसके पीछे के कारणों को जाना जाए तो एक ही बात सामने आती है कि फतेहपुरसीकरी सीट पर जीत के समीकरण रखने वाले अपने ही नेताओं को प्रत्याशी न बनाकर पार्टी नेतृत्व ने खुद ही ये हालात पैदा किए हैं। ऐसा नहीं है कि बसपा नेतृत्व इनमें से किसी को प्रत्याशी नहीं बनाना चाहता था, लेकिन कुछ ऐसे हालात थे कि इन स्थानीय नेताओं में से एक भी फतेहपुरसीकरी से पार्टी की उम्मीदवारी की योग्यता की परीक्षा पास नहीं कर सका।
बसपा में गैर दलित नेताओं की संख्या अच्छी खासी थी, जिन्होंने पार्टी के लिए विधान सभा और लोकसभा के चुनाव जीते हैं, लेकिन वे सभी एक-एक कर बसपा से रुखसत हो रहे हैं। गैर दलित समाज के नेताओं बसपा के प्रति आकर्षण इसलिए था कि बसपा समर्थित दलित वोट उन्हें चुनाव में कामयाबी दिला देते थे। इसका मतलब यह नहीं था कि वे केवल दलित वोटों के बूते पर जीत जाते थे। इस जीत में प्रत्याशी के खुद के वोट, खासकर उनकी विरादरी के वोट भी होते थे। इसी को बसपा की सोशल इंजीनियरिंग कहा जाता था। बसपा में शामिल होने वाले गैर दलित नेताओं को हाथी की सवारी के और पार्टी की टिकट पाने लिए अपनी ‘योग्यता’ साबित करनी होती थी। बसपा इसी सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर पिछले कई दशकों से दूसरे दलों की नींद उड़ाए हुई थी।
विधान सभा के पिछले चुनाव के दौरान भी यूपी बसपा में भगदड़ मची थी। स्वामी प्रसाद मौर्य और नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं ने बसपा प्रमुख मायावती को दौलत की बेटी बताते हुए बसपा से नाता तोड़ लिया था। विधान सभा चुनाव में बसपा 19 सीटों पर सिमट गई थी। लोकसभा के इस चुनाव के लिए बसपा और सपा में गठबंधन हुआ तो बसपा नेतृत्व एक बार फिर पुराने तेवरों में आने लगा। सपा से गठबंधन के बाद जीत की गारंटी मानकर तमाम लोग बसपा का टिकट हासिल करने में लग गए, लेकिन विभिन्न सीटों से पार्टी ने जो प्रत्याशी मैदान में उतारे, उससे पार्टी में पहले से जुड़े नेताओं को मायूसी हाथ लगने लगी।
बसपा ने आगरा की फतेहपुरसीकरी सीट पर पूर्व सांसद सीमा उपाध्याय को प्रत्याशी बनाया था। किन्हीं वजहों से सीमा उपाध्याय ने चुनाव लड़ने से इंकार किया तो इस सीट पर बसपा प्रत्याशी के रूप में पूर्व विधायक डॉ. धर्मपाल सिंह, सूरज पाल सिंह और मेयर का चुनाव लड़ चुके दिगम्बर सिंह धाकरे के नाम चर्चाओं में आ गए। पार्टी इन तीनों पर दांव लगाने को तैयार थी, लेकिन फिर भी ये टिकट पाने से इसलिए वंचित रहे क्योंकि अपने को टिकट के ‘योग्य’ साबित नहीं कर सके। फतेहपुरसीकरी के ठाकुर मतदाताओं के साथ ये तीनों बसपा के लिए जीत का समीकरण बना रहे थे। इसके बावजूद इनके बजाय दिल्ली के राजवीर सिंह को मैदान में उतारा गया तो बसपा से जुड़े इन तीनों ठाकुर नेताओं का धैर्य जवाब दे गया। इन तीनों का मन इतना खट्टा हुआ कि बीते कल पूर्व विधायक डॉ. धर्मपाल सिंह अपने पूर्व गुरु राज बब्बर की शरण में आ गए। सीकरी के पूर्व विधायक सूरज पाल सिंह और खेरागढ़ के पूर्व विधायक भगवान सिंह कुशवाह ने भी पार्टी की रीत-नीति से खिन्न होकर बब्बर के नेतृत्व में कांग्रेस ज्वाइन कर ली। बता दें कि चुनाव हारने के बाद पार्टी में बने रहने की ‘योग्यता’ साबित न कर पाने पर भगवान सिंह कुशवाह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। बसपा के टिकट पर फतेहाबाद से पिछला विधान सभा चुनाव लड़े पं. उमेश सैंथिया पहले ही बसपा से नाता तोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। मेयर का चुनाव लड़े दिगम्बर सिंह धाकरे आज बसपा का साथ थोड़कर भाजपा में शामिल होने जा रहे हैं।
सवाल यह है कि बसपा में ऐसा क्या है कि चुनाव लड़ चुके पूर्व प्रत्याशी हों या फिर पूर्व विधायक, एक-एक कर बसपा छोड़कर जा रहे हैं। इस सवाल का जवाब एक पूर्व विधायक की इस बात में मिल जाता है। ये पूर्व विधायक कहते हैं, ‘बसपा में बने रहने के लिए भी खुद के पास पैसा होना जरूरी है। जब तक जेब ने साथ दिया, पार्टी की डिमांड पूरी की। अब नौबत यह आ गई है कि पार्टी की डिमांड पूरी करने के लिए पैतृक जमीन बेचकर बच्चों के हाथ में कटोरा थमा पड़ेगा। मुझे ऐसी राजनीति नहीं करनी।’

डॉ. अनिल चौधरी का जाना
रालोद के लिए बड़ा झटका

सादाबाद के पूर्व विधायक डॉ. अनिल चौधरी का कांग्रेस में शामिल होना राष्टÑीय लोकदल के लिए एक बड़ा झटका है। जनता के बीच बेहत लोकप्रिय डॉ. अनिल चौधरी इस समय रालोद में वेस्ट यूपी का अध्यक्ष पद संभाले हुए थे। आगरा-अलीगढ़ मंडल में वे रालोद के बड़े चेहरों में से एक थे। डॉ. अनिल चौधरी का राजनीतिक क्षेत्र सादाबाद विधान सभा क्षेत्र है। वे चिकित्सकीय पेशे से जुड़े हुए हैं। आगरा के खंदौली में उनका क्लीनिक है जबकि आगरा में निवास करते हैं। इस लिहाज से आगरा जनपद में भी उनकी लोकप्रियता उतनी ही है जितनी कि सादाबाद में। डॉ. अनिल चौधरी ने कांग्रेस की सदस्यता यूं तो दिल्ली में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के समक्ष ले ली थी, लेकिन कल प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर की आगरा में हुई प्रेस कान्फ्रेंस में उनकी मौजूदगी बब्बर को मजबूती देने वाली थी। जानकार सूत्रों की मानें तो डॉ. अनिल चौधरी रालोद नेतृत्व की नीतियों की वजह से खफा थे।

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