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नगर निगम में माफियागिरी खत्म हो तो मिले गृहकर!

  • कंप्यूटर में नहीं भवनों का पूरा आंकड़ा
  • जेबों में जा रहे हैं हर महीने लाखों रुपये

यहां अपनी जेब भरने की मची है होड़

मेयर नवीन जैन कितनी भी कोशिश कर लें, लेकिन यहां माफियागिरी का राज खत्म नहीं हो सकता। गृहकर में असिस्मेंट के खेल में लिप्त निगमकर्मी इतने ‘बेशर्म’ हैं कि उन्हें चेतावनी और नोटिस की कार्रवाई से कोई फर्क नहीं पड़ता। भले ही वे बदनाम क्यों न हों, लेकिन वे जिस जोन में जो-जो ब्लॉक चाहते हैं मिल जाते हैं। वसूली का दबाव कैसे बाईपास करना है वो अब इसमें मास्टर हैं। कंप्यूटर में भवनों का पूरा ब्योरा न होने से हर महीने लाखों रुपये सुविधा शुल्क के नाम पर जेबों में जा रहे हैं। सवाल उठता है क्या वाकई मेयर की सख्ती इनके लिए कोई मायने नहीं रखती? आरोप लगने के बाद भी जांच क्यों अंजाम तक नहीं पहुंचती हैं? पार्षदों की शिकायत के बाद भी आरोपी पर कार्रवाई क्यों नहीं होती है? क्या यूं ही माफियागिरी निगम को राजस्व की हानि पहुंचाती रहेगी?
वित्तीय वर्ष 2018-19 की समाप्ति में केवल एक पखवाड़ा ही बचा है। नगरायुक्त अरुण प्रकाश की मानें तो गृहकर की वसूली करीब 40 करोड़ रुपये हुई है, जबकि सदन से 50 करोड़ रुपये के गृहकर वसूली का लक्ष्य मिला था, जिसे बढ़ाकर निगम ने 55 करोड़ कर लिया। आये दिन समीक्षा बैठकें हो रही हैं। संबंधित निगम कर्मियों को लक्ष्य दिया गया है। नगरायुक्त ने सफाई और निर्माण कार्य करवाने वाले निगम कर्मियों को भी गृहकर दिलवाने के लिए सहयोग में लगा दिया है। इधर लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई हैं। तमाम निगम कर्मियों की ड्यूटी लग गई हैं। उन्हें उधर भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करना है। ऐसे में वसूली का कार्य प्रभावित हो सकता है। नगर निगम की सीमा में दो लाख से अधिक भवनों की संख्या है, जो गृहकर के दायरे में आते हैं।
सूत्रों की मानें तो हजारों की संख्या में ऐसे भवन हैं, जिनका नगर निगम के कंप्यूटर में कोई रिकॉर्ड नहीं है। माफियागिरी का सिलसिला यहां नहीं रुका। हजारों की संख्या में ऐसे भी भवन हैं जो पहले आवासीय भवन थे, लेकिन वो टूटकर बहुमंजिला हो गये। इतना ही नहीं, इनमें अधिकांश अनावासीय हो गये। इन भवनों से नगर निगम के खजाने में गृहकर आवासीय के हिसाब से आ रहा है, लेकिन यहां कारोबार की गतिविधि हो रही हैं। कंप्यूटर में एंट्री न होने से इनका असिस्मेंट भी मनमाने ढंग से हुआ है। वसूली करने वाले को ही पता है ऐसे भवनों की वास्तविक स्थिति। सूत्रों की मानें तो इस खेल की जड़ें गहरी हैं। माफियागिरी करने वाले किसी भी हद तक चले जाते हैं। इस खेल को संरक्षण देने वाले भी कमाल हैं। वे नकाब पहने हैं, जो बदलता रहता है। कभी सख्ती के पक्ष में तो कभी संरक्षण के। कभी-कभी तो कार्रवाई का डंडा ऐसे चलाते हैं, जैसे नगर निगम को राजस्व की हानि पहुंचाने वालों की आफत आने वाली है। अब वो बच नहीं सकते, लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजरते हैं वैसे ही नकाब का असर दिखने लगता है। यही कारण है कि माफियागिरी करने वालों के हौसले इतने बुलंद हैं कि गृहकर वास्तविक स्थिति में जमा नहीं हो रहा है।
ज्ञातव्य है कि हाल ही में छत्ता जोन का एक मामला प्रकाश में आया, जिसका खुलासा पार्षद ने किया। लंबी बकायेदारी को गायब करके उसका गृहकर जमा करवा दिया। बिना सुनवाई का निर्णय आये ही मामले का निपटारा हो गया। करीब दस साल के गृहकर को साइड कर दिया गया। इससे नगर निगम को लाखों रुपये के राजस्व की हानि हुई। यदि उसके कंप्यूटराइज्ड बिल को देखें तो फर्जीवाड़े के कई सुराग मिल जाएंगे। सोचिए, जब कोर्ट और नगर निगम की सुनवाई के प्रकरण का ऐसा हाल हो सकता है तो आम प्रकरणों में माफियागिरी किस हद तक जा सकती है।
बता दें कि पूर्व नगरायुक्त डीके सिंह ने यहां भवनों के रिकॉर्ड में गड़बड़ी को पकड़ा था। शासन में जो आंकड़े भेजे जाते हैं वो वास्तविक आंकड़ों में बहुत अंतर है। उन्होंने अपने स्तर से मामले की पड़ताल कराई तो सब कुछ स्पष्ट हो गया था कि यहां गृहकर में माफियागिरी का राज है। इसे खत्म करने के लिए उन्होंने कंप्यूटर से करीब सवा लाख भवनों की फीडिंग कराने की दिशा में कदम बढ़ाया था। करीब बीस हजार भवनों की एंट्री हो गई थी। उनके यहां से जाने के बाद कंप्यूटर में एंट्री की चाल गड़बड़ा गई। नगर निगम में सदन हर वित्तीय वर्ष में गृहकर की वसूली का लक्ष्य बढ़ाता है। पार्षदों की मानें तो नगर निगम की जितना बड़ा एरिया है उसके हिसाब से करीब एक अरब रुपये के गृहकर की वसूली होनी चाहिए। यदि इतना गृहकर मिल जाये तो शहर में विकास कार्य बढ़ी संख्या में हो सकते हैं, लेकिन माफियागिरी के कारण निगम को पूरा गृहकर नहीं मिल रहा है। राजस्व को चूना लगाने वाले अपनी जेबों में सुविधा शुल्क के नाम पर भर रहे हैं।

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