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अपनी जेब भरने के लिए गायब कर दी जाती हैं लंबी बकायेदारी!

  • नगर निगम को राजस्व की हानि, बेखौफ चल रहा है खेल
  • कई पाषदों ने अपने-अपने वार्ड क्षेत्र में पकड़ी हैं गड़बड़ी

सदन हर साल हाउस टैक्स वसूली का लक्ष्य रफ्ता-रफ्ता बढ़ाता है, जिसे पूरा करने के लिए अधिकारी एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं लेकिन लक्ष्य को भेद नहीं पाते हैं। इसकी वजह नगर निगम में ‘टैक्स माफिया’ है, जिसका इतना दबदबा है कि अपनी जेब भरने के लिए भवन की लंबी बकायेदारी को ही गायब कर दिया जाता है। इससे निगम को राजस्व की हानि हो रही है। यदि सही तरीके से हाउस टैक्स लिया जाये तो करोड़ों रुपये की आमदनी बढ़ जाएगी। सवाल उठता है बिना किसी अधिकारी की शह मिले टैक्स इतना बड़ा घपला हो रहा है?
भले ही नगर निगम में कंप्यूटर में जो दिखेगा वही आगे बढ़ेगा। जी हां, कंप्यूटर से निकलने वाला बिल पर ही कवायद होती है। इसी बिल के हिसाब से राजस्व निरीक्षक वसूली करके उसे निगम के खजाने में जमा करते हैं। कंप्यूटर से निकला बिल वाकई सही या गलत इसका पता तो मामले की गहराई (जांच) में जाने के बाद ही होता है। ऐसे ही कुछ मामले प्रकाश में आये हैं। एक मामले में तो फर्जीवाड़े की हद की पार हो गई। ये मामला छत्ता जोन का है। भैंरो बगीची निवासी प्रेमसिंह ने भवन संख्या 8/390 में कुछ हिस्सा खरीदा। इसका नामांतरण (म्यूटेशन) करवाने की प्रक्रिया शुरू की। प्रेम सिंह ने नगरायुक्त को दिये शिकायती पत्र में कहा कि मेरी पत्नी रूपवती के नाम से है। छत्ता वार्ड के बाबू शिवपाल सिंह सोलंकी को 15,100 रुपये दिये। इसके बदले बाबू ने 10,100 रुपये की रसीद दी। बाकी पांच रुपये की रसीद मांगी तो मना कर दिया। कहा गया कि इन रुपयों की कोई रसीद नहीं मिलती। ऊपर अधिकारियों को देने पड़ते है। बाबू के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। इसके बाद प्रेम सिंह ने पार्षद राकेश जैन को इस मामले की जानकारी दी। पार्षद ने बताया कि पीड़ित प्रेम सिंह के मामले में हकीकत पता करने के लिए प्रयास किये गये तो हाउस टैक्स में फर्जीवाड़ा निकला। भवन संख्या 8/390/1-5 पर हाउस टैक्स की बकायेदारी का थी। इसके को लेकर कोर्ट की शरण भी ली गई। इसके बाद नगर निगम में वाद चला।
पार्षद राकेश जैन ने बताया कि इस भवन पर 2004 से टैक्स की बकायेदारी थी। ये भवन अनावासीय है। इसकी फाइल पर आख्या लगाई गई। संबंधित राजस्व निरीक्षक ने अपने स्वार्थ के लिए नगर निगम को लाखों रुपये के राजस्व की हानि पहुंचा दी। जो टैक्स 2004 से लिया जाना था वो 2014 से लिया गया। कोर्ट की फाइल गायब करके बिल से करीब दस साल की बकायेदारी भी गायब कर दी। कंप्यूटर में 2014 से दर्शाकर उसका टैक्स जमा करवा दिया। इतना बड़ा घपला हुआ है। राजस्व निरीक्षक की मेहरबानी से इतने बड़े भवन से केवल 27,592 रुपये के हिसाब से ही टैक्स लिया जा रहा है। पार्षद का कहना है कि इसी भवन पर करीब ग्यारह लाख रुपये का मामला चल रहा था, जो करीब 1.37 लाख रुपये में ही निपटा दिया। फाइल सुनवाई में चल रही थी। सुनवाई में निर्णय क्या हुआ। इससे जुड़े इस्तावेज गायब हैं। इस तरह के तमाम मामले हैं, जिनमें नगर निगम को राजस्व की हानि पहुंचाई गई। इसलिए ही टैक्स वसूली का लक्ष्य पूरा नहीं होता है। अब सबूतों के साथ नगरायुक्त से शिकायत करेंगे। इस तरह का षड्यंत्र रचने वाले राजस्व निरीक्षक एवं बाबू के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे।

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